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Sunday, September 27, 2015

मॉडर्न और कंटेम्परेरी का ट्विस्ट रहेगा फेस्टिव सीज़न में

Florals set to rule Navratri 2015

अगर आपने अभी तक अपना गरबा के लिए अपनी आउटफिट रेडी नहीं की है तो अब भी समय है। फटाफट लेटेस्ट ट्रेंड्स स्कैन करो और अपनी ड्रेस से सबको अपने स्टाइल का मुरीद बना लो। फैशन वर्ल्ड में इस बार फेस्टिव सीज़न में विभिन्न रंगों के फ्लोरल प्रिंट्स ट्रेंड में रहेंगे। इसलिए ब्राइट फ्लोरल प्रिंट में ड्रेस डिज़ाइन करवाएं...


मॉडर्न और कंटैम्परेरी का ट्विस्ट
फ्लोई फुल लेंग्थ स्कर्ट्स फैशन इंडस्ट्री में छाई हुई हैं। इंडियन फैशन ने भी अपने कुछ बेसिक ट्रेडिशनल आउटफिट्स को रीडिफाइन किया है और इसे मॉडर्न और कंटेम्परेरी ट्विस्ट दिया है। वेडिंग लहंगा से लेकर चनिया चोली तक में क्रॉप टॉप्स ट्रेंड में हैं। फ्लोरल प्रिंट्स विंटेज इंग्लिश एरा की याद दिलाते हैं और नवरात्रि जैसे कलरफुल फेस्टिवल के साथ इसे टीम अप करके आप अद्भुत ड्रामेटिक इफेक्ट क्रिएट कर सकती हैं। इस साल फ्लोरल्स दुपट्टे और चनिया में ट्रेंड में है। हालांकि पुरुष बड़े और बोल्ड फ्लोरल प्रिंट्स में नहीं इठला सकते। उन्हें छोटे, छोटी पत्ती और फूलों वाले प्रिंट्स फबेंगे। इसलिए इस साल गरबा ग्राउंड्स में फूल खिलेंगे।

ऐसे दें खुद को स्टाइलिश लुक
कॉलेज गर्ल्स लेटेस्ट फैशन ट्रैंड्स फॉलो करना पसंद करती हैं। खुद को स्टाइलिश लुक देने के लिए कपड़ों से उन्हें खासा प्यार होता है। इसलिए वो वह सब खरीद लेती हैं जो ट्रैंड में होता है और जो उनके कम्फर्ट ज़ोन में फिट हो जाए। इस साल फैशन की दुनिया में फ्लोरल्स का ही राज रहा है। फ्लोरल प्रिंट की चनिया और रंगीन प्लेन क्रॉप टॉप के साथ कंट्रास्ट दुपट्टा और कंटैम्परेरी ज्यूलरी पहन कर जब आप गरबा ग्राउंड जाएंगी तो यकीन मानिए आप सबकी नज़रों में छा जाएंगी। चूंकि प्रिंट बोल्ड और बड़ा है, इसलिए मेकअप कम ही करें। आप फ्लोरल क्रॉप टॉप या ब्लाउज़ पहनना चाहती हैं, तो इसके साथ आप जो चनिया पहनें उस पर कुछ फ्लोरल मोटिव्स अच्छे लगेंगे। 

स्टेटमेंट एक्सेसरी से दिखें ग्लैमरस
नवरात्रि पर आउटफिट का स्टाइल और फैशन तो हर साल बदल जाता है लेकिन अॉक्सीडाइज़्ड ज्यूलरी हमेशा से ट्रैंड में रहती है। इस साल अपने फ्लोरल लुक को पीप अप करने के लिए कुछ कलरफुल जंक ज्यूलरी के साथ एक्सपैरिमेंट करने की कोशिश करें। आर्टिस्टिक पैंडेट वाले स्टेटमेंट नेकलैस और बड़े-बड़े फ्लोरल स्टड्स आपके लुक और स्टाइल को ग्लैमरस बना देंगे। फ्लोरल आउटफिट् चूंकि बहुत कलरफुल होती है, इसलिए आप अपनी ड्रैस के रंगों के साथ अपनी चूढ़ियां मैच करके अपने स्टाइल को फैस्टिव कर सकती हैं। अपने फ्लोरिएटिड लुक को पूरा करने के लिए बहुत बारीक हैड चेन या छोटे-से फ्लोरल जैम के साथ माथा पट्टी कैरी करें।

मज़ा लें रोमांटिक शाम का
आमतौर पर नवरात्रि की आउटफिट्स सारा साल अलमारी के एक कोने में पड़ी रहती हैं, जब तक आप उसे अगले साल के नवरात्रों के लिए कुछ तैयारी के साथ दोबारा फाइनल नहीं करतीं। हालांकि ऐसा अक्सर हो नहीं पाता है क्योंकि हर साल ट्रैंड बदल जाता है। पिछले साल की चनिया इस साल पुरानी हो जाती है और रैग लुक देती है। हालांकि फ्लोरल ट्विस्ट के साथ आप नवरात्रि के कपड़ों को रोज़मर्रा के कपड़ों की तरह भी पहन सकती हैं। आपकी चनिया को आप कैजुअल क्रॉप टॉप्स के साथ स्कर्ट के तौर पर कभी भी पहन सकती हैं। तो फिर देर किस बात की फ्लोरल चनिया को बूट या गलैडिएटर्स के साथ पहनें और साथ में कैरी करें एक स्मार्ट सा बैग और आप एक रोमांटिक शाम का मज़ा लेने के लिए तैयार हैं।

Thursday, October 10, 2013

सातवें नवरात्र में सरस्वती पूजन


सातवें नवरात्र में सरस्वती पूजन

नवरात्रि के 9 दिनों में दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें शास्त्रों में नवदुर्गा कहा गया है। नवरात्रि के पहले तीन दिन शक्ति की देवी मां पार्वती की पूजा होती है जिसके जरिए हमारे सारे कष्टों और पापों का नाश होता है। अगले दिन दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है और धन-धान्य की कृपा अपने पर बनाए रखने के लिए देवी का आशीर्वाद मांगा जाता है। नवरात्रि के आखिरी तीन दिन विद्या, ज्ञान और बुद्धि की देवी मां सरस्वती के तीन रूपों की पूजा की जाती है। इस तरह नवरात्रि के 9 दिनों की पूजा सम्पन्न होती है।
नवरात्रों का सातवां दिन वीणावादिनी, शुभ्रवसना, मंद-मंद मुस्कुराती हंस पर विराजमान मां सरस्वती के आह्वान का होता है। सरस्वती का जन्म ब्रह्मा जी के मुंह से हुआ था। मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान व विवेक की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस अंधकारमय जीवन से इंसान को सही राह पर ले जाने का सारा बीड़ा वीणा वादिनी सरस्वती मां के कंधों पर ही है। यह देवी मनुष्य समाज को महानतम सम्पत्ति-ज्ञानसम्पदा प्रदान करती है।  
वेदों में सरस्वती का वर्णन श्वेत वस्त्रा के रूप में किया गया है। यानी वह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं जो हमें प्रेरणा देते हैं कि हम अपने भीतर सत्य अहिंसा, क्षमा, सहनशीलता, करुणा, प्रेम व परोपकार आदि सद्गुणों को बढाएं और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अहंकार आदि दुर्गुणों से स्वयं को बचाएं। श्वेत पुष्प व मोती इनके आभूषण हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें वीणा, पुस्तक और अक्षरमाला है। उनका वाहन हंस है तथा श्वेत कमल गुच्छ पर यह विराजमान हैं। वेद इन्हें जलदेवी के रूप में महत्ता देते हैं, एक नदी का नाम भी सरस्वती है।
पुराणों में मां सरस्वती को कमल पर बैठा दिखाया जाता है। कीचड़ में खिलने वाले कमल को कीचड़ स्पर्श नहीं कर पाता। इसीलिए कमल पर विराजमान मां सरस्वती हमें यह संदेश देना चाहती हैं कि हमें चाहे कितने ही दूषित वातावरण में रहना पड़े, परंतु हमें खुद को इस तरह बनाकर रखना चाहिए कि बुराई हम पर प्रभाव न डाल सके। मां सरस्वती की पूजा-अर्चना इस बात की द्योतक है कि उल्लास में बुद्धि व विवेक का संबल बना रहे।
मां सरस्वती के पूजन से मानव जीवन का अज्ञान रूप दूर होकर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है। मां सरस्वती की कृपा मनुष्य में कला, विद्या, ज्ञान तथा प्रतिभा का प्रकाश करती है। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। सत्वगुण से उत्पन्न होने के कारण इनकी पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों में अधिकांश श्वेत वर्ण की होती हैं। जैसे- श्वेत चंदन, पुष्प, परिधान, दही-मक्खन, धान का लावा, सफेद तिल का लड्डू, अदरक, श्वेत धान, अक्षत, शुक्ल मोदक, घृत, नारियल और इसका जल, श्रीफल, बदरीफल आदि। सभी सामाजिक कार्यक्रमों का आरंभ भी इसीलिए सरस्वती वंदना से होती है ताकि कार्य सर्वोत्तम तरीके से पूर्ण हो।

सरस्वती शुक्ल वर्णासस्मितांसुमनोहराम। 
कोटिचन्द्रप्रभामुष्टश्री युक्त विग्रहाम।
वह्निशुद्धांशुकाधानांवीणा पुस्तक धारिणीम्।
रत्नसारेन्द्रनिर्माण नव भूषण भूषिताम।
सुपूजितांसुरगणैब्रह्म विष्णु शिवादिभि:।
वन्दे भक्त्यावन्दितांचमुनीन्द्रमनुमानवै:।


मां सरस्वती का मूल मंत्र

'शारदा शारदाभौम्वदना। वदनाम्बुजे।
सर्वदा सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रिया तू।'

मां सरस्वती का श्र्लोक

ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।।
कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।
वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।।
रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।
सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।।
वन्दे भक्तया वन्दिता च मुनीन्द्रमनुमानवै:।

मां सरस्वती की आरती

कज्जल पुरित लोचन भारे, स्तन युग शोभित मुक्त हारे |
वीणा पुस्तक रंजित हस्ते, भगवती भारती देवी नमस्ते ॥

जय सरस्वती माता जय जय हे सरस्वती माता |

सदगुण वैभव शालिनी त्रिभुवन विख्याता ॥ जय.....

चंद्रवदनि पदमासिनी घुति मंगलकारी |
सोहें शुभ हंस सवारी अतुल तेजधारी ॥ जय.....

बायेँ कर में वीणा दायें कर में माला |
 शीश मुकुट मणी सोहें गल मोतियन माला ॥ जय.....

देवी शरण जो आयें उनका उद्धार किया |
पैठी मंथरा दासी रावण संहार किया ॥ जय.....

विद्या ज्ञान प्रदायिनी ज्ञान प्रकाश भरो |
 मोह और अज्ञान तिमिर का जग से नाश करो ॥ जय.....

धुप दिप फल मेवा माँ स्वीकार करो |

ज्ञानचक्षु दे माता भव से उद्धार करो ॥ जय.....
 

माँ सरस्वती जी की आरती जो कोई नर गावें |
हितकारी सुखकारी ग्यान भक्ती पावें ॥ जय.....

जय सरस्वती माता जय जय हे सरस्वती माता |
सदगुण वैभव शालिनी त्रिभुवन विख्याता ॥ जय.....

मां सिद्धिदात्री : मां दुर्गा की नौवीं शक्ति

मां सिद्धिदात्री : मां दुर्गा की नौवीं शक्ति


या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।


दुर्गा मां ने जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुई और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का। नवरात्रि-पूजन के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है। नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।

देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है। माता सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। मां कमल आसन पर विराजमान रहती हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बांयी तरफ नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है। देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है। देवी जी की भक्ति जो भी सच्चे मन से करता है मां उसी पर अपना स्नेह लुटाती हैं। मां का ध्यान करने के लिए आप “सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी..” इस मंत्र से स्तवन कर सकते हैं।

सिद्धिदात्री की पूजा विधि

देवी सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं। देवी प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं उन्हें नवमी के दिन निर्वाण चक्र का भेदन करना चाहिए। दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। हवन से पूर्व सभी देवी दवाताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए। बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार हवि दें। भगवान शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा पश्चात अंत में इनके नाम से हवि देकर आरती और क्षमा प्रार्थना करें। हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया है उसे बाटें और हवन की अग्नि ठंडी को पवित्र जल में विसर्जित कर दें अथवा भक्तों के में बांट दें। यह भस्म- रोग, संताप एवं ग्रह बाधा से आपकी रक्षा करती है एवं मन से भय को दूर रखती है।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

आरती

जै सिद्धि दात्री मां तूं है सिद्धि की दाता|
तूं भक्तों की रक्षक तूं दासों की माता||

तेरा नाम लेटे ही मिलती है सिद्धि|
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि||

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम|
जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम||

तेरी पूजा में तो न कोई विधि है|
तूं जगदम्बे दाती तूं सर्व सिद्धि है||

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो|
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो||

तूं सब काज उसके करती हो पूरे|
कभी काम उसके रहे न अधूरे||

तुम्हारी दया और तुम्हारी है माया|
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया||

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्य शाली|
जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली||

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा|
महा नन्दा मंदिर में है वास तेरा||

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता|
चमन है सवाली तूं जिसकी दाता||

महागौरी : मां दुर्गा की आठवीं शक्ति

महागौरी : मां दुर्गा की आठवीं शक्ति

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया॥


 
मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। मां गौरी को शिव की अर्धागनी और गणेश की माता के रुप में जाना जाता है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। अष्टवर्षा भवेद् गौरी यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है।  इनका वाहन वृषभ है। इसीलिए वृषारूढ़ा भी कहा गया है इनको। महागौरी की चार भुजाएं हैं। इनका दाहिना ऊपरी हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर-मुद्रा में है। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। शिव जी की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते हुए मां गौरी का शरीर धूल मिट्टी से ढंककर मलिन यानि काला पड़ गया था। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब शिव जी ने इनके शरीर को पवित्र गंगाजल से मलकर धोया तब वह विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर हो गया, तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।

यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। मां महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से आर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। महागौरी की उपासना से मनपसंद जीवन साथी एवं शीघ्र विवाह संपन्न होता है। मां कुंवारी कन्याओं से शीघ्र प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा जीवन साथी प्राप्त होने का वरदान देती हैं। यदि किसी के विवाह में विलंब हो रहा हो तो वह भगवती महागौरी की साधना करें, 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ' मंत्र की तथा 'ॐ महा गौरी देव्यै नम:' मंत्र की इक्कीस माला जाप करें। मनोरथ पूर्ण होगा। देवी महागौरी का ध्यान, स्रोत पाठ और कवच का पाठ करने से 'सोमचक्र' जाग्रत होता है जिससे संकट से मुक्ति मिलती है और धन, सम्पत्ति और श्री की वृध्दि होती है।

आज के दिन ही अन्नकूट पूजा यानी कन्या पूजन का भी विधान है। कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ रहता है। इस पूजन में 9 कन्याओं को भोजन कराया जाता है। अगर 9 कन्याएं ना मिलें तो दो से भी काम चल जाता है। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार महामाया भगवती प्रसन्नता से हमारे मनोरथ पूर्ण करती हैं।

मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


अर्थ : हे मा! सर्वत्र विराजमान और मां गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे मां, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

धयान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥

कालरात्रि : मां दुर्गा की सातवीं शक्ति

कालरात्रि : मां दुर्गा की सातवीं शक्ति 

देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


 
अपने महाविनाशक गुणों से शत्रु और दुष्ट लोगों का संहार करने वाली मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि हैं। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। मां कालरात्रि के शरीर का रंग अंधकार की तरह गहरा काला है, इनके केश बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत सदृश चचमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्मांड की तरह गोल हैं, इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं।

इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। जो समस्त जीव जंतुओं में सबसे ज्यादा परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है। चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं। ऊपर का दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है जिससे यह सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है जिससे अपने सेवकों को अभयदान करती हैं और भक्तों को सभी कष्टों से मुक्त करती हैं। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है।

मां का यह स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। यह देवी अपने भक्तों पर असीम कृपा करती हैं और उनकी हर तरह से रक्षा करती हैं। इसलिए इनसे भक्तों को भयभीत होने की कतई आवश्यकता नहीं। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। यह ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना का विधान है। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं। इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णत: मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है, उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह अधिकारी होता है, उसकी समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। जो व्यक्ति देवी कालरात्रि की एकाग्रचित्त होकर पूजा करता है देवी उसकी सभी बाधाएं दूर करती हैं। भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। अगर आप परेशानियों का सामना कर रहें है तो नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि के मंत्र का देवी पूजा के दौरान जरूर जप करें।

उपासना मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्मा खरास्थिता |
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा |
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिभयंकरी ||

ध्यान

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥



Monday, October 7, 2013

कात्यायनी : मां दुर्गा की छट्टी शक्ति

कात्यायनी : मां दुर्गा की छट्टी शक्ति


चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥


नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी कात्यायनी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है। यह अमोद्य फलदायिनी हैं। इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है। मां कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं। भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है। इसलिए कहा जाता है कि इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

इस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। श्री कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती हैं। साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौलिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।

इनका गुण शोध कार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। ये वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी।इसीलिए ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है।

मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है। यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरद मुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है।

कहा जाता है महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। दूसरी कथा यह है कि जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इनकी पूजा की.इस कारण से भी यह कात्यायनी कहलायीं।

मां कात्यायनी की पूजा विधि

जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के छठे दिन मां कात्यायनी जी की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए। इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कात्यायनी सभी प्रकार के भय से मुक्त करती हैं।

दुर्गा पूजा के छठे दिन भी सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं। इनकी पूजा के पश्चात देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है। पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है। देवी की पूजा के पश्चात महादेव और परम पिता की पूजा करनी चाहिए। श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए।

मंत्र

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

स्कन्दमाता : मां दुर्गा की पांचवी शक्ति

स्कन्दमाता :  मां दुर्गा की पांचवी शक्ति

भगवती दुर्गा के पांचवे स्वरुप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द की माता होने के कारण इन्हें स्कन्द माता कहते हैं। स्कन्द का एक नाम कार्तिकेय भी है। यह प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। उन्होंने देवताओं के शत्रु ताड़कासुर का वध किया था। इनके विग्रह में स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे हैं।

स्कन्दमातृ स्वरुपिणी देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। मां का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। सिंह इनका वाहन है।

शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी स्कन्दमाता की नवरात्रि में पूजा अर्चना करने का विशेष विधान है। नवरात्रि पूजन के पांचवे दिन इन्हीं माता की उपासना की जाती है।शास्त्रों के अनुसार स्कन्दमाता की पूजा करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है और उसे इस मृत्युलोक में परम शांति का अनुभव होने लगता है। माता की कृपा से उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में होता है।

पौराणिक कथानुसार भगवती स्कन्दमाता ही पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती हैं। महादेव की पत्नी होने के कारण माहेश्वरी और अपने गौर वर्ण के कारण गौरी के नाम से भी माता का पूजन किया जाता है। माता को अपने पुत्र से अधिक स्नेह है और इसी कारण इन्हें इनके पुत्र स्कन्द के नाम से जोड़कर पुकारा जाता है। स्कन्द माता की उपासना से बालरूप स्कन्द भगवान की उपासना स्वयं हो जाती है। मां स्कन्द माता की उपासना से उपासक की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं।

उपासना मंत्र

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

कवच

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥


भगवती स्कन्दमाता का ध्यान स्तोत्र व कवच का पाठ करने से विशुद्ध चक्र जागृत होता है। इससे मनुष्य की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। परम शांति व सुख का अनुभव होने लगता है।

चंद्रघंटा : मां दुर्गा की तीसरी शक्ति

चंद्रघंटा : मां दुर्गा की तीसरी शक्ति 

नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरुप यानी मां चंद्रघंटा की उपासना होती है। मां का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है इसलिए इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है।

मां चंद्रघंटा के शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनकी पूजा-अर्चना भक्तों को जन्म-जन्मांतर के कष्टों से मुक्त कर इहलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है। देवी स्वरूप चंद्रघंटा बाघ की सवारी करती हैं।  इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र हैं। इनके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है। अपने दो हाथों से यह साधकों को चिरायु आरोग्य और सुख-संपदा का वरदान देती हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं खत्म हो जाती हैं। इनकी आराधना सर्वफलदायी है। इनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से छूटकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। मां भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

 ॐ चन्द्रघण्टायै नमः

इस मंत्र की 5 माला जाप रुद्राक्ष या लाल चन्दन की माला से नवरात्र के तीसरे दिन करें। हम आपको मणिपूरक चक्र के बारे में इतना बता देना आवश्यक समझते हैं कि इस चक्र पर मंगल ग्रह का आधिपत्य होता है।  मां चन्द्रघण्टा आपकी मनोकामना पुरी करे इसी कामना के साथ।

मां भगवती चन्द्रघंटा का ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

मां भगवती चन्द्रघंटा का स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

मां भगवती चन्द्रघंटा का कवच मंत्र

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥
                                                                                                                      
 

कूष्मांडा माता माता : मां दुर्गा की चौथी शक्ति

कूष्मांडा माता : मां दुर्गा की चौथी शक्ति

आदिशक्ति श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। पूरा संसार कूष्मांडा ही है। पौराणिक आख्यानों में कूष्मांडा देवी ब्रह्मांड को पैदा करती हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। कूष्मांडा देवी की कल्पना एक गर्भवती स्त्री के रूप में की गई है अर्थात् जो गर्भस्थ होने के कारण भूमि से अलग नहीं है। इन देवी को ही तृष्णा और तृप्ति का कारण माना गया है।  संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक पसंद है। इसलिए भी इन्हें कूष्मांडा कहा जाता है।

दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है

कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डेमांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा.

इसका अर्थ है वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्मांडा हैं। देवी कूष्मांडा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं। जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था। देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंडल सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात् फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ। देवी कूष्मांडा सूयमंडल में निवास करती हैं और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं।

मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। मां  दाहिने प्रथम हाथ में कुंभ अपनी कोख से लगाए हुए हैं, जो गर्भावस्था का प्रतीक माना जाता है। दूसरे हाथ में चक्र, तीसरे में गदा और चौथे में देवी सिद्धियों और निधियों का जाप करने वाली माला को धारण करती हैं। बांए प्रथम हाथ में कमल पुष्प, द्वितीय में शर, तृतीय में धनुष तथा चतुर्थ में कमंडल लिए हुए है। देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं।

कूष्मांडा मां सिंह पर आरूढ़, शांत मुद्रा की भक्तवत्सल देवी हैं। श्री कूष्मांडा के पूजन से अनाहत चक्र जाग्रति की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। श्री कूष्मांडा की उपासना से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है, सभी कष्ट दूर हो जाते हैं, भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्ति से आरोग्यता के साथ-साथ आयु और यश की प्राप्ति होती है। इसलिए इस दिन अत्यंत पवित्र और शांत मन से मां कूष्मांडा की उपासना संपूर्ण विधि-विधान से करनी चाहिए। कहा जाता है कि मां कूष्मांडा लाल गुलाब चढ़ाने पर अति प्रसन्न होती हैं।

देवी कूष्मांडा की पूजा करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें

”सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥“


देवी की पूजा के पश्चात महादेव और परम पिता की पूजा करनी चाहिए। श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए।

कुष्मांडा मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥