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Thursday, September 18, 2014

दुर्गा के नौ रूपों की आराधना से शांत हो जाते हैं नवग्रहों के प्रकोप

दुर्गा के नौ रूपों की आराधना से शांत हो जाते हैं नवग्रहों के प्रकोप 


आश्विन माह में आने वाले इन नवरात्रों को ‘शारदीय नवरात्र’ कहा जाता है। शारदीय नवरात्र की महिमा सर्वोपरि है। शरदकाले महापूजा क्रियते या च वाष्रेकी। दुर्गा सप्तशती के इस वचन के अनुसार शारदीय नवरात्र की पूजा वार्षिक पूजा होने के कारण महापूजा कहलाती है। यह भक्तों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। नौ दिनों तक चलने नवरात्र पर्व में मां दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है। 


नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों में लोग नियमित रूप से पूजा-पाठ और व्रत का पालन करते हैं। अनेक पौराणिक कथाओं में शक्ति की अराधना का महत्व व्यक्त किया गया है। एक पौराणिक कथानुसार महाराक्षस रावण का वध करने के लिए भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शारदीय नवरात्र का व्रत किया था और तभी जाकर उन्हें विजयश्री की प्राप्ति हुई थी। दुर्गा पूजा के नौ दिन तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक क्रिया कलाप संपन्न किए जाते हैं।

मां दुर्गा की उपासना करने से स्वर्ग जैसे भोग और मोक्ष जैसी शान्ति मिलती है। भगवती दुर्गा अपने भक्तों का वात्सल्य भाव से कल्याण करती है।  नवरात्र के दिनों में चोरी, झूठ, क्रोध, ईष्र्या, राग, द्वेष एवं किसी भी प्रकार का छल नहीं करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि मन, वचन एवं कर्म से किसी का दिल दु:खाना नहीं चाहिए। जहां तक सम्भव हो, दूसरों का भला करना चाहिए। मान्यता है कि नवरात्री में नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ रूपों की आराधना करने वाले पर से नवग्रहों के प्रकोप शांत हो जाते हैं और जीवन में सुख, शांति, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है।


शैलपुत्री – सूर्य
चंद्रघंटा – केतु
कुष्माण्डा – चंद्रमा
स्कन्दमाता – मंगल
कात्यायनी – बुध
महागौरी – गुरु
सिद्धिदात्री – शुक्र
कालरात्रि – शनि
ब्रह्मचारिणी – राहु

नवरात्र तिथि

पहला नवरात्र, प्रथमा तिथि, 25 सितंबर 2014, दिन बृहस्पतिवार
दूसरा नवरात्र, द्वितीया तिथि, 26 सितंबर 2014, दिन शुक्रवार.
तीसरा नवरात्र, तृतीया तिथि, 27 सितंबर 2014, दिन शनिवार.
चौथा नवरात्र, चतुर्थी तिथि, 28 सितंबर 2014, रविवार.
पांचवां नवरात्र , पंचमी तिथि , 29 सितंबर 2014, सोमवार.
छठा नवरात्र, षष्ठी तिथि, 30 सितंबर 2014, मंगलवार.
सातवां नवरात्र, सप्तमी तिथि, 1 अक्तूबर 2014, बुधवार
आठवां नवरात्र, अष्टमी तिथि, 2 अक्तूबर 2014, गुरूवार,
नौवां नवरात्र, नवमी तिथि, 3 अक्तूबर 2014, शुक्रवार
दशहरा, दशमी तिथि, 3 अक्तूबर 2014, शुक्रवार से प्रारंभ होकर शनिवार प्रात:काल तक रहेगी.


Monday, October 7, 2013

स्कन्दमाता : मां दुर्गा की पांचवी शक्ति

स्कन्दमाता :  मां दुर्गा की पांचवी शक्ति

भगवती दुर्गा के पांचवे स्वरुप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द की माता होने के कारण इन्हें स्कन्द माता कहते हैं। स्कन्द का एक नाम कार्तिकेय भी है। यह प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। उन्होंने देवताओं के शत्रु ताड़कासुर का वध किया था। इनके विग्रह में स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे हैं।

स्कन्दमातृ स्वरुपिणी देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। मां का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। सिंह इनका वाहन है।

शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी स्कन्दमाता की नवरात्रि में पूजा अर्चना करने का विशेष विधान है। नवरात्रि पूजन के पांचवे दिन इन्हीं माता की उपासना की जाती है।शास्त्रों के अनुसार स्कन्दमाता की पूजा करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है और उसे इस मृत्युलोक में परम शांति का अनुभव होने लगता है। माता की कृपा से उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में होता है।

पौराणिक कथानुसार भगवती स्कन्दमाता ही पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती हैं। महादेव की पत्नी होने के कारण माहेश्वरी और अपने गौर वर्ण के कारण गौरी के नाम से भी माता का पूजन किया जाता है। माता को अपने पुत्र से अधिक स्नेह है और इसी कारण इन्हें इनके पुत्र स्कन्द के नाम से जोड़कर पुकारा जाता है। स्कन्द माता की उपासना से बालरूप स्कन्द भगवान की उपासना स्वयं हो जाती है। मां स्कन्द माता की उपासना से उपासक की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं।

उपासना मंत्र

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

कवच

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥


भगवती स्कन्दमाता का ध्यान स्तोत्र व कवच का पाठ करने से विशुद्ध चक्र जागृत होता है। इससे मनुष्य की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। परम शांति व सुख का अनुभव होने लगता है।