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Tuesday, December 24, 2013

सांता आया, खुशियां लाया

सांता आया, खुशियां लाया


सांता क्लॉज़ क्रिसमस से जुड़ा एक लोकप्रिय पौराणिक परंतु कल्पित पात्र हैं। सांता क्लॉज़ को सेंट निकोलस , फादर क्रिसमस, क्रिस क्रिंगल, और "सांता" के नाम से जाना जाता है। सांता क्लॉज़ को आम तौर पर एक मोटे, हंसमुख सफ़ेद दाढ़ी वाले आदमी के रूप में चित्रित किया जाता है, जो सफ़ेद कॉलर और कफ़ वाला लाल कोट पहनता है, इसके साथ वह चमड़े की काली बेल्ट और बूट पहनता है। माना जाता है कि फादर क्रिसमस का पात्र ब्रिटेन में 17 वीं शताब्दी में लोकप्रिय था। उनकी तस्वीरें उसी समय से मौजूद हैं। इन तस्वीरों में उन्हें एक हंसमुख, दाढ़ी वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया गया, जिसने एक लम्बी, हरी, पूरे अस्तर वाली पोशाक पहनी है।

सांता की आधुनिक छवि संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में 19 वीं सदी में लोकप्रिय हुई। इस छवि को लोकप्रिय बनाने में एक अमेरिकी कार्टूनिस्ट थॉमस नास्ट ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1863 में, नास्ट के द्वारा बनायी गयी सांता की एक तस्वीर हार्पर'स वीकली में प्रकाशित की गयी।  नास्ट की तस्वीरों के एक रंगीन संग्रह को 1869 में प्रकाशित किया गया, इसमें जोर्ज पी. वेबस्टर के द्वारा लिखी गयी एक कविता "सांता क्लॉज़ एंड हिस वर्क्स" भी थी। इसमें लिखा गया की सांता क्लॉज़ का घर "उत्तरी ध्रुव के पास, बर्फ में था"। यह कहानी 1870 के दशक तक काफी प्रसिद्ध हो गयी। गानों, रेडियो, टेलिविज़न, बच्चों की किताबों और फिल्मों के माध्यम से इस छवि को बनाये रखा गया है।

सांता क्लॉज़ की छवियां बाद में और अधिक लोकप्रिय हो गयीं जब हेद्दन संदब्लोम ने 1930 में कोका-कोला कम्पनी के क्रिसमस विज्ञापन के लिए उनका चित्रण किया। इस छवि की लोकप्रियता ने कुछ शहरी कथाओं को जन्म दिया कि सांता क्लॉज़ की खोज कोका कोला कंपनी के द्वारा की गयी है या यह कि सांता लाल और सफ़ेद रंग के कपड़े पहनता है क्योंकि इन रंगों का उपयोग कोका कोला ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। हालांकि लाल और सफ़ेद रंग की पोशाक मूल रूप से थॉमस नास्ट के द्वारा दी गयी थी।

सांता का घर

अक्सर ऐसा कहा जाता है कि फादर क्रिसमस सांता क्लॉज़ फिनलैंड के लोपलैंड प्रान्त में कोरवातुन्तुरी के पहाड़ों में अपनी पत्नी श्रीमती क्लॉज़ के साथ रहते हैं। उनके साथ एक अनिर्दिष्ट परन्तु बड़ी संख्या में कल्पित बौने, और कम से कम आठ या नौ उड़ने वाले रेन्डियर रहते हैं। एक और लोककथा जो गीत "सांता क्लॉज़ इस कमिंग टू टाउन" में प्रचलित है, के अनुसार वह पूरी दुनिया के बच्चों की एक सूची बनाते हैं, उन्हें उनके व्यवहार ("शरारती" और "अच्छे") के अनुसार अलग अलग श्रेणियों में रखते हैं, और क्रिसमस की पूर्व संध्या वाली रात, दुनिया के सभी अच्छे लड़कों और लड़कियों को खिलौने, केंडी, और अन्य उपहार देते हैं, और कभी कभी शरारती बच्चों को कोयला देते हैं। इस काम के लिए वह अपने एक बौने की सहायता लेते हैं जो वर्कशॉप में उनके लिए खिलौने बनाता है।

कौन थे सांता

चर्च के इतिहास और लोक कथाओं से उपहार देने वाले पात्रों विशेष रूप से सेंट निकोलस और सिंटरक्लास के चित्रण को ब्रिटिश पात्र फादर क्रिसमस के साथ मिला दिय गया है, जिससे एक नया पात्र सामने आया है जिसे ब्रिटेन और अमेरिका के लोगों के द्वारा सांता क्लॉज़ के नाम से जाना जाता है। सेंट निकोलस चौथी सदी के एक ग्रीक ईसाई बिशप थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन ईसाई धर्म के लिए समर्पित कर दिया। निकोलस गरीब लोगों को उदार दिल से उपहार देने के लिए प्रसिद्द थे। उनका उद्देश्य था कि क्रिसमस और नववर्ष के दिन गरीब-अमीर सभी प्रसन्न रहें।  उनकी सद्भावना और दयालुता के किस्से लंबे अर्से तक कथा-कहानियों के रूप में चलते रहे। उन्होंने एक पवित्र ईसाई की तीन बेटियों के लिए दहेज़ दिया, ताकि उन्हें वेश्या बनने से रोका जा सके। एक कथा के अनुसार उन्होंने कोंस्टेटाइन प्रथम के स्वप्न में आकर तीन सैनिक अधिकारियों को मृत्यु दंड से बचाया था। सत्रहवीं सदी तक इस दयालु का नाम संत निकोलस के स्थान पर सांता क्लॉज हो गया। यूरोप में (विशेष रूप से नीदरलैंड्स, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया और जर्मनी में) उन्हें आज भी ईसाई धर्म की पोशाक में एक दाढ़ी वाले बिशप के रूप में दर्शाया जाता है।

सांता, बच्चे और उपहार

क्रिसमस को अक्सर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है। इसलिए बच्चों में इस पर्व को लेकर काफी उत्साह देखा जाता है। सांता क्लॉज़ बच्‍चों को प्‍यार करता है। माना जाता है कि क्रिसमस की रात सफेद रंग की बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछों वाले सांता क्लॉज रेंडियर पर चढ़कर किसी बर्फीले जगह से आते हैं यानी क्रिसमस फादर स्वर्ग से उतरकर चिमनियों के रास्ते घरों में प्रवेश करके सभी अच्छे बच्चों के लिए  उपहार छोड़ जाते हैं।

दुनिया भर के बच्चे सांता क्लॉज़ से उपहार पाने की उम्मीद में, उससे जुडी कई रस्में पूरी करते हैं। कुछ रस्में क्रिसमस के कुछ दिन या सप्ताह पहले पूरी की जाती हैं, जबकि कई अन्य रस्मों को क्रिसमस की पूर्व संध्या पर ही पूरा किया जाता है जैसे सांता के लिए विशेष नाश्ता बनाना। कुछ रस्में सदियों पुरानी हैं जैसे मोजा लटकाना, ताकि वह उपहारों से भर जाये। कुछ अन्य रस्में आधुनिक प्रकार की हैं जैसे क्रिसमस की पूर्व संध्या पर रात के आकाश में सांता की गाड़ी का नोराड के द्वारा पता लगाया जाना।

सांता को पत्र

सांता क्लॉज़ के लिए पत्र लिखना कई सालों से बच्चों में क्रिसमस की एक परम्परा रही है। इन पत्रों में बच्चे अक्सर खिलौनों की इच्छा जाहिर करते हैं और अच्छा व्यवहार करने का वादा करते हैं। मैक्सिको और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों में, मेल के अलावा बच्चे कभी कभी अपने पत्र को एक छोटे से हीलियम के गुब्बारे में लपेट देते हैं, उसे हवा में छोड़ देते हैं। उन्हें लगता है कि जादू से यह पत्र सांता के पास पहुंच जाएगा। ब्रिटेन में कुछ लोगों में यह परंपरा है कि क्रिसमस के पत्रों को आग में जला दिया जाता है. ऐसा माना जाता है कि ये पत्र जादू से उत्तरी ध्रुव तक पहुंच जायेंगे. हालांकि इस प्रथा को सामान्य पोस्टल सेवा के उपयोग की तुलना में कम प्रभावी पाया गया है, और यह परंपरा आधुनिक समय में समाप्त होती जा रही है।

जीवन की निरंतरता का प्रतीक क्रिसमस ट्री

जीवन की निरंतरता का प्रतीक क्रिसमस ट्री

क्रिसमस के मौके पर क्रिसमस ट्री का विशेष महत्व है। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर क्रिसमस ट्री दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इस पर बिजली के रंगबिरंगे बल्ब जगमगाते रहते हैं। खूबसूरत फूल भी इसको महकाते हैं। इसे मिठाइयों, केक, रिबन और कलरफुल कागज लगाकर सजाया जाता है। लोग इस सदाबहार पेड़ को जीवन की निरंतरता का प्रतीक मानते हैं। उनका विश्वास है कि क्रिसमस ट्री को घरों में सजाने से बुरी आत्माएं दूर रहती हैं। अमेरिका के अरबपति क्रिसमस ट्री की विशेष सज्जा के लिए कीमती आभूषणों का प्रयोग करते हैं। हीरे-मोती से जड़े  आभूषण इसकी पतली-पतली टहनियों में पिरोए जाते हैं। बाद में इन आभूषणों को गरीबों में बांट दिया जाता है।

मॉडर्न क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा जर्मनी में शुरू हुई। उस समय एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फर के पेड़ लगाए जाते थे। इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था। इस पिरामिड को हरे पत्तों और मबत्तियों से सजाया जाता था और सबसे ऊपर एक सितारा लगाया जाता था। बाद में 16वीं शताब्दी में फर का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री। उसके बाद जर्मनी के लोगों ने 24 दिसंबर को फर के पेड़ से अपने घर की सजावट करनी शुरू कर दी।

क्रिसमस ट्री को घर-घर पहुंचाने में मार्टिन लूथर का भी काफी हाथ रहा। कहते हैं कि क्रिसमस के दिन जब लूथर अपने घर लौट रहे थे, तब उन्हें आसमान में टिमटिमाते हुए तारे बहुत खूबसूरत लगे, जो पेड़ों पर लगे होने का आभास दे रहे थे। उन्हें यह दृश्य इतना भाया कि वह पेड़ की डाल तोड़कर घर ले जाए और उसे तारों से सजा दिया।

18वीं शताब्दी तक क्रिसमस ट्री बेहद पॉप्युलर हो चुका था। इंग्लैंड में 1841 में राजकुमार पिंटो एलबर्ट ने विंजर कासल में क्रिसमस ट्री को सजावाया था, जिसे नार्वे की महारीनी ने प्रिंस को उपहार स्वरूप दिया था। उसने पेड़ के ऊपर एक देवता की दोनों भुजाएं फैलाए हुए मूर्ति भी लगवाई, जिसे काफी सराहा गया। क्रिसमस ट्री पर प्रतिमा लगाने की शुरुआत तभी से हुई। 19वीं शताब्दी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से कुछ ही दिनों में इसने पूरी दुनिया में अपनी जगह बना ली। 

क्रिसमस ट्री की उत्पत्ति को लेकर कई किवदंतियां हैं। क्रिसमस ट्री की कथा है कि जब महापुरुष ईसा का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता को बधाई देने आए देवताओं ने एक सदाबहार फर को सितारों से सजाया। कहा जाता है कि उसी दिन से हर साल सदाबहार फर के पेड़ को 'क्रिसमस ट्री' प्रतीक के रूप में सजाया जाता है। 

क्रिसमस ट्री लगाने की शुरुआत ब्रिटेन के संत बोनीफस ने सातवीं शताब्दी में की। उन्होंने त्रियक परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की प्रतीकात्मकता दर्शाने के लिये त्रिकोणीय लकड़ी को लोगों के सामने रखा। यह लकड़ी फर वृक्ष की थी। ऐसा माना जाता है कि संत बोनिफेस इंग्लैंड को छोड़कर जर्मनी चले गए। जहां उनका उद्देश्य जर्मन लोगों को ईसा मसीह का संदेश सुनाना था। इस दौरान उन्होंने पाया कि कुछ लोग ईश्वर को संतुष्ट करने हेतु ओक वृक्ष के नीचे एक छोटे बालक की बलि दे रहे थे। गुस्से में आकर संत बोनिफेस ने वह ओक वृक्ष कट‍वा डाला और उसकी जगह फर का नया पौधा लगवाया, जिसे संत बोनिफेस ने प्रभु यीशु मसीह के जन्म का प्रतीक माना और उनके अनुयायियों ने उस पौधे को मोमबत्तियों से सजाया। तभी से क्रिसमस पर क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा चली आ रही है।

इसके अलावा इससे जुड़ी एक और कहानी मशहूर है, वह यह कि एक बार क्रिसमस पूर्व की संध्या में कड़ाके की ठंड में एक छोटा बालक घूमते हुए खो जाता है। ठंड से बचने के लिए वह आसरे की तलाश करता है, तभी उसको एक झोपड़ी दिखाई देती है। उस झोपड़ी में एक लकड़हारा अपने परिवार के साथ आग ताप रहा होता है। लड़का इस उम्मीद के साथ दरवाजा खटखटाता है कि उसे यहां आसरा मिल जाएगा। लकड़हारा दरवाजा खोलता है और उस बालक को वहां खड़ा पाता है। उस बालक को ठंड में ठिठुरता देख लकड़हारा उसे अंदर बुला लेता है। उसकी बीवी उस बच्चे की सेवा करती है। उसे नहला कर, खाना खिलाकर अपने सबसे छोटे बेटे के साथ उसे सुला देती है। दरअसल, वह बच्चा एक फरिश्ता था। जब सुबह हुई, तो उस लड़के ने जंगल में लगे हुए फर के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को दे दिया। बालक ने लकड़हारे से कहा कि वह इसे जमीन में दबा दे। अगले साल क्रिसमस पर इस पेड़ में फल आएंगे। लकड़हारे ने वैसा ही किया। एक साल बाद वह पेड़ पर सोने के सेब और चांदी के अखरोट से भर गया। यह था वो क्रिसमस ट्री, जिसे आज भी हम सभी सजाते हैं।

कहा जाता है, यूरोप में  पहले ‘यूल’ नामक पर्व मनाया जाता था, जो अब बड़ा दिन के उत्सव में घुल मिल गया है। इस त्योहार में पेड़ों को खूब सजाया जाता था। सम्भवत: इसी से क्रिसमस ट्री की प्रथा चल पड़ी।

कुछ लोगों का कहना है कि ईसा पूर्व से ही क्रिसमस ट्री की परम्परा कायम थी। सदाबहार फर वृक्ष के ईसा पूर्व भी पवित्र माना जाता था। मिस्र के लोग शरद ऋतु में सबसे छोटे दिन का त्योहार मनाते थे। इसदिन वे खजूर के पत्ते अपने घरों में लाते थे, जो जीवन का मृत्यु पर विजय का प्रतीक था। रोम के निवासी शनि त्योहार के दिन हरे पेड़ की शाखाओं को हाथ में लेकर ऊपर उठाते थे और त्योहार में शामिल होते थे।

आया खुशियों का त्यौहार ‘क्रिसमस’


आया खुशियों का त्यौहार ‘क्रिसमस’ 

क्रिसमस शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है। क्रिसमस या बड़ा दिन प्रभु के पुत्र ईसा मसीह या यीशु के जन्म की खुशी में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और आमतौर पर इस दिन लगभग पूरी दुनिया में छुट्टी रहती है। यूं तो 25 दिसंबर को यीशु का जन्मदिन होने का कोई तथ्यपूर्ण प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन समूची दुनिया इसी तिथि को यह रोमन पर्व सदियों से मनाती चली आ रही है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ईस्वी में मनाया गया था।

परम्परागत रूप से क्रिसमस 12 दिन तक चलने वाला उत्सव है। प्रभु ईसा मसीह का जन्मदिन संपूर्ण विश्व में 
सभी समुदाय के लोग अपनी-अपनी परंपराओं एवं रीति-रिवाजों के अनुसार श्रद्धा, भक्ति, निष्ठा और उल्लास के साथ एक धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक उत्सव के रूप मे मनाते हैं। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर को ही इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं। गिरजाघरों को बिजली की लडिय़ों से आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। यहां यीशु के जन्म से संबंधित झांकियां तैयार की जाती हैं। कैरोल (Carols) गाए जाते हैं।

क्रिसमस की पूर्व रात्रि, गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है जो रात के 12 बजे तक चलती है क्योंकि 24 दिसंबर की आधी रात यीशु का जन्म होना माना जाता है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं, खुशियां मनाते हैं और एक-दूसरे को उपहार देते हैं। अगले दिन धूमधाम से त्योहार मनाया जाता है। क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में विशेष प्रार्थना सभा होती है। क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं। वे प्‍यार व भाई चारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं। क्रिसमस का विशेष व्यंजन केक है, केक बिना क्रिसमस अधूरा होता है। भगवान यीशु मसीह के जन्मोत्सव को सेलीब्रेट करने के लिए क्रिसमस केक भी गिरिजाघरों में सजाए जाते हैं।

व्यापक रूप से स्वीकार्य एक ईसाई पौराणिक कथा के अनुसार, प्रभु ने मेरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत को भेजा, जिसने मेरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी तथा बच्चे का नाम जीसस रखा जाएगा। वह बच्चा बड़ा होकर राजा बनेगा और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी।

देवदूत गैब्रियल, एक भक्त जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मेरी एक बच्चे को जन्म देगी, तथा उसे (जोसफ को) मेरी की देखभाल करनी चाहिए। जिस रात जीसस का जन्म हुआ, उस समय नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मेरी और जोसफ बेथलेहम जाने के रास्ते में थे। उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्‍म हुआ।

सच्चाई, ईमानदारी की राह पर चलने और दीन-दुखियों की भलाई की सीख देने वाले ईसा मसीह के विचार उस समय के क्रूर शासक पर नागवार गुजऱे और उसने प्रभु-पुत्र को सूली पर टांगकर हथेलियों में कीलें ठोंक दीं। इस यातना से यीशु के शरीर से प्राण निकल गए, मगर कुछ दिन बाद वह फिर जीवित हो उठे। ईसा के दोबारा ज़िन्दा हो जाने की खुशी में ईस्टर मनाया जाता है।